सम्प्राप्य भारते जन्म

सम्प्राप्य भारते जन्म सत्कर्मसु पराङ्मुखः
पीयूषकलशं हित्वा विषभाण्डं स इच्छति

भारतभूमि पर जन्म मिलने पर भी जो सत्कर्मो से दूर रहता है, वह अमृतकलश को फोड़ कर विष से भरे घड़े को चाहने वाले के समान है।

सुभाषितम् - Page 19