नाव किनारे लग गयी, बच्चे मुक्त हो गए

बुद्धि चातुर्य और चंचलता क्या नहीं करवा लेती है। बालक तो स्वयं ईश्वर रूप ही है. उसका रूप मनोहर व् उसके सभी क्रियाकलाप चित्ताकर्षक होते हैं। बालक नरेंद्र ज्यों -ज्यों शैशव पारकर किशोरावस्था में प्रवेश कर रहा था उसकी गतिविधियां घर की सीमा पार करके मोहल्ले भर में फैलती जा रहे थे। व्यायामशाला में व्यायाम, विशाल कक्षाओं में अभिनय, मित्रों के मध्य लाठी, कुश्ती व् तैराकी का अभ्यास चलता रहता था। सशक्त व सबल शरीर ही बड़े काम कर सकता है। इष्ट मित्रों के वे मुखिया थे। निर्धन हो या धनी, दुर्बल हो या सबल, छोटा हो या बड़ा उसका हंसमुख व्यक्तित्व सभी के आकर्षण का केंद्र था। संकोच कहीं उन्हें छू न गया था। उनके चारों और हंसी के फव्वारे छूटते थे; परंतु किसी दुख-दर्द रोग या चिंता के प्रसंग पर वे सेवा करने में सबसे आगे रहते थे। सर्वत्र उनकी पहुंच थी। आशा उत्साह और उल्लास उनके चारों और नाचता रहता था।

मित्र मंडली के नेता थे, सेर-सपाटे,वन विहार में उनका नेतृत्व कुशल था। सूझ-बूझयुक्त बातें हों या स्वादिष्ट व्यंजनों का तैयार करना,खेलकूद हो या संगीत, संकट हो या विनोद, वे सदा आगे ही दिखते थे। एक बार वे अपनी मित्र मंडली के साथ कलकत्ता नगर के बाहर मटियाबुर्ज के बाग में नवाबों का चिड़ियाघर देखने गए थे । लौटते समय उनका एक साथी अकस्मात बीमार पड़ गया। उसे हैजा हो गया। सभी सहयोगियों को चिंता हो गई नाव से नदी पार करने के लिए वे सवार हो गए ।नाव वाले को पता चला तो बिगड़ उठा। उसने उन्हें उतर जाने को कहा। यह कैसे हो सकता था? उल्टे उन्हें तो जल्दी थीं। उन्होंने नाविक को दुगना किराया देने तक का विचार किया। अतः घाट पर आने से पूर्व ही उसने लड़कों को पार ले जाने से मना कर दिया।

नाविक ने अपने साथी भी जुटा लिए थे। अजीब समस्या आकर खड़ी हो गई। नरेंद्र को एक तरकीब सूझ गयी, वह झट कूद पड़ा हुआ व भागकर पास में ही जा रहे दो अंग्रेज सैनिकों के पास जाकर अपनी कठिनाई कह सुनायी । टूटी-फूटी अंग्रेजी में उनसे उनका शीघ्र ही विश्वास प्राप्त कर लिया। हाथ पकड़कर बालक उन्हें पास बुला लाया। किरारे पर आकर अंग्रेज सैनिकों ने परिस्थितियों की गंभीरता समझ ली व डांट कर नाव वाले को आदेश दिया कि वे नाव किनारे लगावे। नाविक डर गये। नाव किनारे पर आ गयी। बच्चे मुक्त कर दिए गये। इस बार तो उन्हें उतराई का किराया भी ना देना पड़ा। मित्रों की चिंता का भार हट गया। वे नरेंद्र के बुद्धि चातुर्य पर मुग्ध थे।

Author: राणा प्रताप सिंह

Source: स्वामी विवेकानंद प्रेरक जीवन प्रसंग Volume 1, page 14

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