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Geet, Subhashita, AmrutVachan and Bodhkatha

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subhashita:yasya_nasti_swyam

यस्य नास्ति

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शास्त्रं तस्य करोति किं।
लोचनाभ्याम विहीनस्य, दर्पण:किं करिष्यति।।

A person who does not have his own (prudence) conscience ethology is of no use, just as mirror is useless for a blind person.

जिस मनुष्य के पास स्वयं का(प्रज्ञा) विवेक नहीं है, उसके शास्त्र किस काम के, जैसे नेत्रविहीन व्यक्ति के लिए दर्पण व्यर्थ है।

Source: samayocitapadyamālikā